सच

by vj 3. April 2009 18:58

कुछ ऊँचे रिश्तों की खातिर
कुछ ज्यादा खुशियों की खातिर
कुछ ज्यादा पैसों की खातिर
कुछ हंसते लम्हों की खातिर,

मैं छोड़ चला था दुनिया को,
मैं छोड़ चला था उस आँचल को,
और घर के प्यारे आँगन को,
और बहन की हंसती आँखों को,
राखी से सजी उस थाली को,
और छोडा अपने यारों को,
गम में तडपते प्यारों को,
मुड के भी ना मैने देखा था,
दर्द भरी उन आँखों को,

जिस दुनिया को मैने पाया,
वो दुनिया नहीं एक धोखा था,
एक गरम हवा का छोंका था,
आया और आ कर चला गया,
फिर भी पैसा खूब कमाया,
और कुछ सम्मान भी पाया,
पर सच नहीं वो धोखा था,
जब आज जोड़ने मैं बैठा
देखा कुछ तो न पाया था,

जिस राखी को मैने तोडा,
जिस आँचल को मैने छोडा,
naa मिलेंगे वो राखी, आँचल,
मैं छोडूँ चाहे दुनिया को,
सब छोड़ चला था मैं जैसे,
उसमे तो कुछ तो मुझे दे दो,
मुझको तो "आप" से 'तुम' कर दो,
मैं छोड़ चला था दुनिया को,

'मुझको मेरी दुनिया दे दो'

-शांडिल्य

 

Thanks Shandily :)

Will provide a translation shortly.

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